रविवार, 18 नवंबर 2007

धर्मनिरपेक्षता के पाखंडी वाहक

उन्होनें कहा-
लादेन मरे या बुश, हम दोनों में खुश.
फिर जोड़ा-
ना लादेन मरे ना बुश, लगे दोनों पर अंकुश.

उनकी बातें सुनकर पूछा मैनें उनसे
लादेन और बुश की हो रही है लड़ाई
उसमें हिन्दूओं की क्यों हो रही है कुटाई ?
आपके पास क्या है इसका जवाब ?

उन्होनें उत्तर दिया-
सरासर गलती तो हिन्दूओं की हीं है.
क्यों वह समर्थन सच्चाई का कर रहे हैं ?

तब मैनें पूछा- हे जनाब !
उन निहथ्थे रामसेवकों का दोष क्या था,
जो जला दिये गये साबरमती की बोगियों में?

मेरी बात सुनकर रहा न गया उनसे
तमतमा गया चेहरा उनका
बोले,
क्या बात करते हो यार !
क्यों गये थे अयोध्या में होकर तैयार ?

वो जले तो ठीक हीं जले,
मरे तो ठीक हीं मरे.
यदि कोई हिन्दू मरा तो समझो कि उसने जरूर कोई गलती की होगी.

आखिर इस धर्मनिरपेक्ष देश में,
क्या उनको यह भी नहीं है अधिकार
कि वो मार सकें काफिरों को बार-बार?

वे तो अपने धर्म पर हैं अडिग.
उनका तो धर्म कहता है-
जो तेरी राह में हो पड़े,
उन्हे मारकर बनो तगड़े (गाज़ी).

उन्होनें तो केवल अपना काम किया
नाहक हीं उनको तुमने बदनाम किया.

जरा-सा रूक कर पूछा उन्होनें मुझसे-
बताओ श्रीमान् !
ये संघी क्यों लगाते हैं साम्प्रदायिक आग,
हिन्दूओं को ये क्यों भड़काते हैं
क्यों उन्हें जागृति का पाठ पढ़ाते हैं ?
ये तो सो रहे थे, नाहक हीं उन्हे जगा दिया.

अरे ! हिन्दूओं का तो काम ही है सहना
और बार-बार मरना.
ये लोग भी कोई लोग हैं,
आज मर-कट रहे हैं तो हो रहा है हल्ला.

इतना सुनकर रहा न गया मुझसे
मैनें कहा-
धन्य हो मेरे भाई
तुम्हारे रहते अन्य कौन बन सकता है कसाई.
हमें मारने के लिये तो आप जैसे धर्मनिरपेक्ष हीं काफी हैं.

अब वह दिन दूर नहीं,
जब आप जैसों के अनथक प्रयास से
ये अपाहिज-कायर हिन्दू मिट जायेंगे जहाँ से
मैं तो बेकार हीं कोस रहा था आपके प्यारों को
अरे ! आपके सामने उनकी क्या औकात है ?
ये सब घटनायें तो आप जैसों की सौगात है.


(इन पंक्तियों को लिखे लगभग ४-५ साल हो रहे हैं किन्तु इसमें लिखी बातें आज भी उतनी ही सत्य हैं.  कुछ लोग मेरे शैली से असहमत हो सकते हैं किन्तु सिरे से खारिज नहीं कर सकते हैं.)

4 टिप्‍पणियां:

  1. यह आपकी पाँच वर्ष पूर्व २४ सितम्बर २००२ की रची कविता सचमुच एक बहु-व्यापक यथार्थ का चित्रण करती है पर इसमें निराशा की मात्रा ज्यादा दिखती है । लेकिन एक बात माननी ही पड़ेगी कि राजनीतिक कारणों से जो हिन्दुओं के विरुद्ध ही कार्य को धर्मनिरपेक्ष मानते हैं, वे लोग भी सनातन धर्म की जीवटता से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते हैं । उन्हें इसे महत्त्व देना ही पड़ता है भले ही बहुत ही कम मात्रा में और वह भी मजबूरी में । यह भी समझ लेना चाहिए कि हमारा धर्म सनातन है इसे कोई कितना भी दबाए कभी नष्ट नहीं कर सकता है क्योंकि इसकी जड़ें देवालयों और कुछ बिन्दुओं में नहीं हैं बल्कि जनों की आत्मा तक घुसी हुई हैं । जो अपने को धार्मिक नहीं कहता वह भी हमारे त्योहारों में बढ़-चढ़ कर भाग लेता है । इन धार्मिक त्योहारों का स्वरूप कर्मकाण्डीय के साथ साथ बहुत सामाजिक और सांस्कृतिक भी है ।

    सनातन धर्म तो सनातन ही है।

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  2. बहुत बढिया कहा हॆ आपने । इस सुसंगठित धार्मिक दुनिया में जबकि लोग धर्म की आर में लड रहें हों, स्वयं के अस्तित्व की रक्षा के लिए हमें भी कुछ न कुछ करना ही पडेगा।

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  3. Diwakar Jee, As per my view u r going to rock the word. AAPNE AAPNI YAADEIN TAAZAA KAR DI.I don't think any one can write or speak a SUDH hindi or sanskrit now a days. But you have done the gr8 job.. Please keep it uP. My best wishes is always with you.

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  4. बहुत सही बात कही आप ने दिवकर भाई..अगर सेकुलर जमात ऐसे ही पलती बढती रही तो इससे भी ज्यादा दुर्दिन देखने पड़ेंगे..इन पाकिस्तानी एजेंटो से पहले सेकुलरों का खात्मा जरुरी है..

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