गुरुवार, 3 सितंबर 2009

मणिना दिवाकराय नमः


प्रातः की इस वेला में

प्राची में आ रहे भाष्कर से

केवल यही है विनती

कि मेरे सहचरों को रखो

हमेशा

स्वस्थ एवं सानन्द.

करते रहें अनथक वे कार्य

जब तक कि उनमें है दृढ़

विश्वास.

[इन पंक्तियों को मैंने करीब तीन साल पहले लिखा था और गूगल-ग्रुप "हिन्दी-कविता" में इसे 29-अक्टूबर-2006 को पोस्ट किया था. इसे आप वहां भी देख सकते हैं. चित्र को अभी-अभी बनाया है....]

6 टिप्‍पणियां:

  1. मित्र जब आप यह चित्र बना रहे थे तो मैनें भी देखा था...! खैर आपका विचार और कविता दोनों ही सराहनीय हैं।

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  2. इस के लिये ओर सुरेश जी के ब्लॉग पर टिपण्णी मे लिखे शब्दों के लिये बधाई

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  3. मैनें अपने सभी ब्लागों जैसे ‘मेरी ग़ज़ल’,‘मेरे गीत’ और ‘रोमांटिक रचनाएं’ को एक ही ब्लाग "मेरी ग़ज़लें,मेरे गीत/प्रसन्नवदन चतुर्वेदी "में पिरो दिया है।

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  4. वाह ! आपका जेएनयु पर महाभारत वाला पेज देखा. कहीं अर्थ सहित ऑनलाइन मिलेगा क्या? संस्कृत इतनी नहीं आती कि महाभारत समझ ले :) वैसे आप पुणे में हैं तो कभी मिलते हैं. अभी पुणे में हैं या दिल्ली में? पुणे में तो कहाँ? abhishek.ojha[AT]gmail.com

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