रविवार, 27 जनवरी 2008

चुनरिया में दाग लाग गईल (निरगुन)

बइठल रोवेली गुजरिया हो,
चुनरिया में दाग लाग गईल
कइसे जाईं पिया के नगरिया हो,
चुनरिया में दाग लाग गईल

आईल बा गवना के हमरो सनेसवा,
जाएके बा हमरा पियवा के देशवा
काँच बावे हमरी उमिरिया हो,
चुनरिया में दाग लाग गईल
बइठल रोवेली गुजरिया हो,
चुनरिया में दाग लाग गईल

नईहर में चार गो यार बनउलीं,
दिनरात उन्हीं से नैना लड़उलीं
उनके सुतउलीं हम सेजरिया हो,
चुनरिया में दाग लाग गईल
बइठल रोवेली गुजरिया हो,
चुनरिया में दाग लाग गईल

चार बात सजना के हम भूल गईलीं,
पछतात बानी का कईलीं
डोली आईल हमरो दुअरिया हो,
चुनरिया में दाग लाग गईल
बइठल रोवेली गुजरिया हो,
चुनरिया में दाग लाग गईल

चुनरिया के दाग "दीप" कईसे छुड़ाईब,
कईसे हम सजना के मुँहवा देखाईब
बरसेली अँखिया से बदरिया हो,
चुनरिया में दाग लाग गईल
बइठल रोवेली गुजरिया हो,
चुनरिया में दाग लाग गईल

[जब भी भोजपुरी गीत-संगीत की बात होती है तो यह मान लिया जाता है कि "गुड्डु रंगीला" टाइप व्यक्तियों के अश्लील गीत हीं भोजपुरी विरासत के प्रतिनिधि हैं. आइए, इस भ्रम को दूर करने हेतु उपरोक्त दार्शनिकता के पुट वाले गीत का मजा लें. ऐसे सामाजिक, राजनैतिक, दार्शनिक विषयों को आधार लेकर लिखे हुए गीतों का "भोजपुरी-साहित्य" में प्राचुर्य है. हाँ, यह अवश्य है कि हाईटेक प्रचार-प्रसार में ये गीत "रंगीला" टाइप गायकों के गीतों से थोड़े पीछे हैं.
अस्तु, प्रस्तुत गीत में मनुष्य-जन्म की सार्थकता को बतलाते हुए कहा जा रहा है कि हमने अपना सम्पूर्ण जीवन तो ऐसे ही निरर्थक बिता दिया. जिस उद्देश्य हेतु परमपिता ईश्वर ने हमें इस धरती पर भेजा था, उसको अब जाकर क्या जवाब दूँगा? ]

3 टिप्‍पणियां:

आपकी टिप्पणी ही हमारा पुरस्कार है।