शनिवार, 14 जुलाई 2007

पुरुषविवेचनम्

एके सत्पुरुषाः परार्थघटकाः स्वार्थं परित्यज्य ये, 
सामान्यास्तु परार्थमुद्यमभृतः स्वार्थाविरोधेन ये ।
तेऽमी मानुषराक्षषाः परहितं स्वार्थाय निघ्नन्ति ये,
ये निघ्नन्ति निरर्थकं परहितं ते के न जानीमहे ॥
-भर्तृहरिणा, नीतिशतकात्.

सरलसंस्कृतार्थ :- ये तु स्वार्थं त्यक्त्वा परार्थं साधयन्ति ते सज्जनाः, ये स्वार्थ अविरोधेन परार्थं कुर्वन्ति ते साधारणाः, ये च केवलं स्वार्थपराः सन्तः परार्थं विध्वंसयन्ति ते राक्षसप्रकृतयोऽधम-कोटिभाजो उच्यन्ते । किन्तु ये निरर्थकं परहिते बाधका भवन्ति ते कथंभूता इति न वयं जानीमः ।

हिन्दी - इस संसार में कुछ ऐसे विरले सज्जन व्यक्ति होते हैं जो अपने स्वार्थ का त्याग करके भी परोपकार करते हैं । ऐसे व्यक्ति के लिए अपना-पराया जैसा भेद नहीं रहता । वह प्रत्येक मनुष्य में उसी सच्चिदानन्द का दर्शन करता है, जो उसके स्वयं के अन्तस् में विद्यमान हैं । अतः किसी का भी दुःख उसका अपना हो जाता है और उस दुःख के निवारणार्थ निज को कष्ट पहुँचाने में भी हिचक नहीं होती । दूसरी कोटि होती है- साधारण प्रकार के व्यक्तियों की, जो अपने स्वार्थ को सिद्ध करते हुए दूसरों के अभीष्ट की भी सिद्धि करते हैं । तृतीय कोटि वाले व्यक्ति नराधम होते हैं जो अपने स्वार्थ की सिद्धि हेतु दूसरों के हित का नाश कर देते हैं । किन्तु ऐसे भी हैं जो परहित का निष्कारण ही हनन करते हैं, उनकी कौन सी कोटि है, यह बताना हमारे वश की बात नहीं ।

1 टिप्पणी:

  1. सुष्ठूक्तं । कीदृशाः ते निरर्थकं परहितबाधने रताः जनाः भवन्ति, वयं कथितुं न शक्नुमः । परं चिन्तयन्तु भवन्तः तादृशां जनानां विषये ये स्वार्थं परित्यज्य तेषामपि चतुर्थकोटिकानां जनानां हितं साधयन्ति यै ते प्रथमं निरर्थकमेव पीडिताः भवन्ति । तत् सर्वं विस्मार्य अपि ते प्रथमकोटिकजनानामिव आचरन्ति ।

    धन्यास्ते कृतिनो वयं न तेषां कोटिं गणिष्यामहे ।

    उत्तर देंहटाएं

आपकी टिप्पणी ही हमारा पुरस्कार है।